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भक्ती

Avis Avis
Posted : Fri/Jul 23, 2021, 08:15 AM - IST

सोबत जोडलेले चित्र नीट निरखून पहा! समर्थ रामदास स्वामींनी भारतभर मठस्थापना केली हे तर आपण जाणतोच.परंतु समर्थांचे पंढरपुरात आजही तीन मठ आहेत हे फार थोड्या लोकांना माहिती असते.समर्थानी पंढरपुरात मठ स्थापना करण्याची आज्ञा ज्या शिष्याला दिली ते अनंतबुवा मेथवडेकर रामदासी!आजही त्यांच्या वंशजांनी हा मठ आणि त्या...

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By  Avis Avis
posted : Wed/Jul 21, 2021, 09:49 AM - IST

Nagpur Division / भक्ती / नवविधा भक्तीमध्ये मी स्वतः कोणत्या पायरीवर आहे. श्रवणं कीर्तनं विष्णो :स्मरणं पादसेवनम् । अर्चनं वंदनं दास्यं सख्यं आत्मनिवेदनम। ।  नवविधा भक्तीत श्रवण ही पहिली पायरी आहे ,तर आत्मनिवेदन ही शेवटची .श्रवण भक्तीमार्गाचे प्रवेशद्वार आहे.श्रवण शब्द्दाचा अर्थ ऐकणे आहे असे आपण म्हणतो ,पण श्रवण म्हणजे नुसते ऐकणे नाही तर ऐकलेले जीवनात उतरवणे.कौरव पांडवांची एक गोष्ट आहे .कौरव पांडवांचे गुरु द्रोणाचार्य मुलांना एक धडा दिला नेहमी खरे बोलावे क्रोध करू नये .दुसा -या दिवशी द्रोणाचार्यनी मुलांना विचारले ,मुलांनो काल काय शिकलात ? मुलांनी दोन्ही वाक़ये पाठ म्हणून दाखवली .युधिष्ठीराने सांगितले ,'माझी दोन्ही वाक़ये पाठ झाली नाहीत .'१० -१२ दिवसाने युधिष्ठीराने पुन्हा तेच उत्तर दिले तेव्हा द्रोणाचार्य ना काळजी वाटू लागली .त्यांनी भिष्माचा-यांना सांगितले .युधिष्टीर भीष्माचा -यांना म्हणाला .'गेल्या १० -१२ दिवसात मी नेहमी खरे बोललो .त्यामुळे ते वाक्य पाठ झाल्यासारखे आहे .पण क्रोध करू नये हे वाक्य पाठ होत नाही . कारण काहीतरी कारणांनी राग येतोच.भीष्मांना आनंद झाला ।.आपल्या नातवाला ऐकणे व श्रवण यातला फरक कळला। समर्थांनी परमार्थाचे मुख्य साधन श्रवण सांगितले आहे .श्रवण अनेक विषयांचे करायला सांगितले आहे -कर्ममार्ग ज्ञानमार्ग ,सिध्दांतमार्ग ,योगमार्ग ,वैराग्य मार्ग ,नाना व्रते ,नाना तीर्थ ,नाना दाने ,नाना महात्मे ,योग ,मुद्रा ,आसने पिंड ज्ञान सृष्टीज्ञान ,संगीत ,चौदा विद्या ,चौसष्ट कला ,या सर्व गोष्टी श्रवण करायला सांगतात. परमार्थ मार्गाला लागणारा साधक चाळीसी पन्नासी नंतर लागला तर तो हे सर्व वाचू शकणार नाही , मग समर्थांनी हे सर्व वाचायला का सांगितल ? कारण समर्थांच्या पुढे त्यांचे कार्य पुढे नेणारा त्यांचा महंत होता .तो बहुश्रुतच असायला हवा होता त्याला लोकांनी विचारलेल्या कोणत्याही प्रश्नाचे उत्तर देता यायला हवे. सामान्य साधक जेव्हा श्रवण करतो तेव्हा त्याला समर्थ मार्गदर्शन करतात. ऐसे हे अवघेची ऐकावे । परंतु सार शोधून घ्यावे । असार ते जाणून त्यागावे । या नाव श्रवण भक्ती । । ४ -१ -२९ । ।  सार म्हणजे समर्थांनी सांगितलेली उत्तम लक्षणे,चातुर्य लक्षणे ,सदविद्या लक्षणे ,सत्वगुण लक्षणे ,सार घ्यायचे म्हणजे वर सांगितलेले सद्गुण आपल्यात उतरवण्याचा प्रयत्न करणे ,असार जाणून टाकावे म्हणजे मूर्ख लक्षणे ,पढ़त मूर्ख लक्षणे ,कुविद्या लक्षणे ,तमोगूण लक्षणे या समासातील दुर्गूण काढून टाकणे. श्रावणात केवळ ऐकणे नसते ,तर ऐकलेल्या गोष्टींचे मनन व्हावे लागते व निदिध्यास ही । या नावे जाणावे मनन । अर्थालागी सावधान । निजध्यासे समाधान । होत असे । । ७ -८ -३९ । ।  मनन म्हणजे आपण जे ऐकतो त्याचे चिंतन करणे ,त्याचे अर्थाकडे लक्ष देणे . निदिध्यास म्हणजे एखाद्या गोष्टीची मनाला लागलेली ओढ़ .



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By  manju manju
posted : Sun/Jul 11, 2021, 03:11 AM - IST

Noida / Srimad Bhagvad... / माहात्म्य-2 भक्ति का दुख दूर करने के लिए नारद जी का उदद्योग नारद जी ने कहा- बाले! तुम व्यर्थ ही अपने को क्यों खेद में डाल रही हो? अरे! तुम इतनी चिन्तातुर क्यों हो? भगवान श्रीकृष्ण के चरण कमलों का चिंतन करो। उनकी कृपा से तुम्हारा सारा दुख दूर हो जाएगा।      



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By  manju manju
posted : Fri/Jul 09, 2021, 11:32 AM - IST

Noida / Srimad Bhagvad... / देवर्षि नारद की भक्ति से भेंट श्रीमदभागवत जी के महात्म के प्रथम अध्याय के पहले श्लोक में सत-चित-आनन्द स्वरूप परमात्मा की स्तुति की गई है नमन किया गया है जिसके द्वारा इस जगत की उत्पत्ति, पालन तथा विनाश आदि हो रहा है, तथा जो इस जगत के प्राणिंयों को उसके जीवन में व्यापत त्रितापों (दैहिक, दैविक तथा भौतिक तापों) अर्थात कष्टों से मुक्ति प्रदान करने वाला है I श्लोक में बताया गया कि परमात्मा सत-चित-आनन्द स्वरूप है सत अर्थात परमात्मा नित्य है शाश्वत है, चित अर्थात शुद्ध चैतन्य स्वरूप तथा आनन्द से परिपूर्ण है तथा वही पर्मात्मा जो इस सम्पूर्ण विश्व का इस बृम्हांड का उत्पत्तिकर्ता है जो इस सम्पूर्ण विश्व का पालन कर रहा है तथा नवश्रजन के लिये इस विश्व का विनाश कर्ता है उस पर्मात्मा श्री कृष्ण को हम सभी जीव नमन करते हैं, यहां श्रीकृष्ण कहा है श्री अर्थात परमात्मा की शक्ति श्री राधा रानी सहित परमात्मा प्रेमाधार कृष्ण को नमन किया गया है I        



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By  Public Reporter
posted : Fri/May 14, 2021, 04:47 AM - IST

Mumbai / जाने क्यों अक्षय... / आज ही के दिन जैनों के प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव जी भगवान ने 13 महीने का कठिन निरंतर उपवास (बिना जल का तप) का पारणा (उपवास छोडना) इक्षु (गन्ने) के रस से किया था। और आज भी बहुत जैन भाई व बहने वही वर्षी तप करने के पश्चात आज उपवास छोड़ते है और नये उपवास लेते है और भगवान को गन्ने के रस से अभिषेक किया जाता है।  ऐसा माना जाता है कि आज ही के दिन माँ गंगा का अवतरण धरती पर हुआ था। ओर महर्षि परशुराम का जन्म आज ही के दिन हुआ था।इसी तरहा ऐसा भी कहा जाता है कि माँ अन्नपूर्णा का जन्म भी आज ही के दिन हुआ था। महाभारत मे द्रोपदी को चीरहरण से कृष्ण ने आज ही के दिन बचाया था। यह आज का ही दिन था जहां कृष्ण और सुदामा का मिलन आज ही के दिन हुआ था।  कुबेर को आज ही के दिन खजाना मिला था। सतयुग और त्रेता युग का प्रारम्भ आज ही के दिन हुआ था। ब्रह्मा जी के पुत्र अक्षय कुमार का अवतरण भी आज ही के दिन हुआ था। प्रसिद्ध तीर्थ स्थल श्री बद्री नारायण जी का कपाट आज ही के दिन खोला जाता है। बृंदावन के बाँके बिहारी मंदिर में साल में केवल आज ही के दिन श्री विग्रह चरण के दर्शन होते हैं। अन्यथा साल भर वो वस्त्र से ढके रहते हैं। इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था। अक्षय तृतीया अपने आप में स्वयं सिद्ध मुहूर्त है। कोई भी शुभ कार्य का प्रारम्भ किया जा सकता है। आप सभी को अक्षय-तृतीया की बहुत सारी शुभकामनायें



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By  manju manju
posted : Mon/May 10, 2021, 11:03 AM - IST

New Delhi / सत्य नारायण व्रत... / दिल्ली/ सत्य नारायण व्रत कथा सत्य नारायण भगवान की कथा लोक में प्रचलित है। हिंदू धर्मावलंबियो के बीच सबसे प्रतिष्ठित व्रत कथा के रूप में भगवान विष्णु के सत्य स्वरूप की सत्य नारायण व्रत कथा है। कुछ लोग मनौती पूरी होने पर, कुछ अन्य नियमित रूप से इस कथा का आयोजन करते हैं। सत्यनारायण व्रत का अनुष्ठान करके मनुष्य सभी दु:खों से मुक्त हो जाता है। कलिकाल में सत्य की पूजा विशेष रूप से फलदायी होती है सत्य के अनेक नाम हैं, यथा-सत्य नारायण, सत्यदेव। सनातन सत्य रूपीविष्णु भगवान कलियुग में अनेक रूप धारण करके लोगों को मनोवांछित फल देंगे।



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By  Public Reporter
posted : Tue/Apr 20, 2021, 12:14 PM - IST

Wardha / माँ ही है ममता की... / नवरात्रि क्यों मनाते है? नवरात्रि यह संस्कृत का शब्द है जो नव+रात्रि यह दो शब्दों को जोड़कर बना है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सृष्टि का निर्माण हुआ था था, इसलिए इस दिन हिन्दू नववर्ष के तौर पर मनाया जाता है। इस दिन को संवत्सरारंभ, गुडीपडवा, युगादी, वसंत ऋतु प्रारंभ दिन आदी नामों से भी जाना जाता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नववर्ष मनाने के नैसर्गिक, ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक कारण हैं। इन नों रातो तक माँ दुर्गा के नों रूपो की पूजा आराधना की जाती है। हिंदी कैलेंडर के अनुसार नवरात्रि वर्ष में 4 बार पोष, चैत्र, शरद, एव आषाढ़ माह में आती है। ओर चारो माह में प्रतिपदा से लेकर नवमी तक नवरात्रि मनाने का नियम है। नवरात्रि क्या है?   यह नवरात्रि हिन्दू धर्मावलम्बीओ के द्वारा मनाया जाने वाला मुख्य पर्व माना जाता है।  कम लोगों को ज्ञात होगा कि एक साल में नवरात्र के 4 बार पड़ते हैं। साल के प्रथम मास चैत्र में पहली नवरात्र होती है, फिर चौथे माह आषाढ़ में दूसरी नवरात्र पड़ती है। इसके बाद अश्विन माह में प्रमुख शारदीय नवरात्र होती है। साल के अंत में माह में गुप्त नवरात्र होते हैं। इन सभी नवरात्रों का जिक्र देवी भागवत तथा अन्य धार्मिक ग्रंथों में भी किया गया है। हिंदी कैलेंडर के हिसाब से चैत्र माह से हिंदू नववर्ष की भी शुरुआत होती है, और इसी दिन से नवरात्र भी शुरू होते हैं, लेकिन सर्वविदित है कि चारों में चैत्र और शारदीय नवरात्र प्रमुख माने जाते हैं। एक साल में यह दो नवरात्र मनाए जाने के पीछे की वजह भी अलग-अलग तरह की है। भारतीय पंचांग के अनुसार चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा से मनाया जाता है. इसे नवसंवत्सर कहते हैं। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार भगवान द्वारा विश्व को बनाने में सात दिन लगे थे। इस सात दिन के सन्धान के बाद नया वर्ष मनाया जाता है। यह दिन ग्रेगरी के कैलेण्डर के मुताबिक 5 सितम्बर से 5 अक्टूबर के बीच आता है। हिन्दुओं का नया साल चैत्र नव रात्रि के प्रथम दिन यानी गुड़ी पड़वा पर हर साल भारतीय पंचांग के अनुसार प्रथम मास का प्रथम चन्द्र दिवस नव वर्ष के रूप में मनाया जाता है। यह प्रायः 21 मार्च से 21 अप्रैल के बीच पड़ता है। ग्रन्थो में लिखा है कि जिस दिन सृष्टि का चक्र प्रथम बार विधाता ने प्रवर्तित किया, उस दिन चैत्र शुदी 1 रविवार था। हमारे लिए आने वाला संवत्सर 2078 बहुत ही भाग्यशाली होगा, क्योंकि इस वर्ष भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को रविवार है, शुदी एवम शुक्ल पक्ष एक ही है। चैत्र नवरात्रि नवरात्रि वह समय होता है जब दो ऋतुएँ मिलती हैं। संयोग की इस अवधि में, ब्रह्माण्ड से असीम शक्तियाँ ऊर्जा के रूप में हमारे पास पहुँचती हैं। हर साल दो नवरात्रि होती है चैत्र नवरात्रि और आश्विन नवरात्रि चैत्र नवरात्रि में गर्मी के मौसम की शुरुआत होती है और इस समय प्रकृति एक बड़े परिवर्तन के लिये तैयार होती है। भारत में, चैत्र नवरात्रि के दौरान, लोग उपवास रखकर, अपने शरीर को आने वाली गर्मी के लिए तैयार करते हैं। प्रतिपदा : पहला दिन 1. पूजित देवी : शैलपुत्री 2. चढ़ाया जाने वाला प्रसाद : केले 3. रंग : इस दिन हरे रंग का महत्व होता है।  द्वितीया : दूसरा दिन 1. पूजित देवी : देवी ब्रह्मचारिणी 2. चढ़ाया जाने वाला प्रसाद : गाय के दूध से बना घी 3. रंग : इस दिन नीला रंग का महत्व होता है।  तृतीया : तीसरा दिन 1. पूजित देवी : देवी चंद्रघंटा 2. चढ़ाया जाने वाला प्रसाद : नमकीन मक्खन 3. रंग : इस दिन लाल रंग का महत्व होता है। चतुर्थी : चौथा दिन 1. पूजित देवी : देवी कुष्मांडा 2. चढ़ाया जाने वाला प्रसाद : चीनी की मिठाई 3. रंग : इस दिन नारंगी रंग का महत्व होता है।  पंचमी : पाचवा दिन 1. पूजित देवी : देवी स्कंदमाता 2. चढ़ाया जाने वाला प्रसाद : चावल का हलवा/दूध 3. रंग : इस दिन पीले रंग का महत्व होता है। षष्ठी : छटवा दिन 1. पूजित देवी : देवी कात्यायनी 2. चढ़ाया जाने वाला प्रसाद : मालपुआ 3. रंग : इस दिन नीले रंग का महत्व होता है। सप्तमी : सातवा दिन 1. पूजित देवी : देवी कालरात्रि 2. चढ़ाया जाने वाला प्रसाद : शहद 3. रंग :  इस दिन बैंगनी रंग का महत्व होता है। अष्टमी : आठवा दिन 1. पूजित देवी : देवी महागौरी 2. चढ़ाया जाने वाला प्रसाद : गुड़, नारियल 3. रंग : इस दिन गुलाबी रंग का महत्व होता है। नवमी : नोवा दिन 1. पूजित देवी : देवी सिद्धिदात्री 2. चढ़ाया जाने वाला प्रसाद : गेहूँ के आटे का हलवा 3. रंग : इस दिन सोनेरी रंग का महत्व होता है।



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By  s verma
posted : Thu/Jan 01, 1970, 05:30 AM - IST

Jabalpur / शैलपुत्रि माता की... / शैलपुत्रि माता की आराधना से शारदीय नवरात्र आरंभ, नवरात्र के पहले दिन मां दुर्गा के ही शैलपुत्री स्वरूप की पूजा की जाती है। महाराज पर्वतराज हिमालय के यहां पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण माता का नाम शैलपुत्री पड़ा। पूर्व जन्म में ये प्रजापति दक्ष की कन्या थीं, तब इनका नाम सती था। इनका विवाह भगवान शिव शंकरजी से हुआ था। जब प्रजापति दक्ष के यज्ञ में माता सती ने अपने शरीर को भस्म कर लिया और अगले जन्म में शैलराज हिमालय के यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया। उपनिषद् की एक कथा के अनुसार मां दुर्गा के हैमवती स्वरूप से देवताओं का गर्व-भंजन किया था। नव दुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री का महत्व और शक्तियां अनन्त हैं। नवरात्र पूजन में प्रथम दिन शैलपुत्री माँ का ही पूजा और उपासना की जाती है।   या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।   माँ  शैलपुत्रि की आरती जय जगजननी जय जगदम्बा अम्बा, शैलपुत्रि माता । नो दुर्गा नो रूप में तुम हो, पहले दिन की माता । ओम शं शैलपुत्रि दैव्ये नमः, ओम शं शैलपुत्रि दैव्ये नमः ।   हेमवती हिम कन्या कहता, कहता कोई  पार्वती । सती हुई तुम पिछले जनम में, दक्ष कन्या महासती । ओम शं शैलपुत्रि दैव्ये नमः, ओम शं शैलपुत्रि दैव्ये नमः ।   नेत्र तुम्हारे तीन हैं मां, वृषभ तुम्हारा वाहन ।  धवल प्रिया श्वेताम्बरी मां, नाम तुम्हारा पावन । ओम शं शैलपुत्रि दैव्ये नमः, ओम शं शैलपुत्रि दैव्ये नमः ।   त्रिशूल है दाएं कर में, कमल है बाएं हाथ में । उसको कोई चिंता नहीं, तुम रहती जिसके साथ में । ओम शं शैलपुत्रि दैव्ये नमः, ओम शं शैलपुत्रि दैव्ये नमः ।   जय जगजननी जय जगदम्बा अम्बा, शैलपुत्रि माता । नो दुर्गा नो रूप में तुम हो, पहले दिन की माता । ओम शं शैलपुत्रि दैव्ये नमः, ओम शं शैलपुत्रि दैव्ये नमः ।



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By  s verma
posted : Thu/Jan 01, 1970, 05:30 AM - IST

Jabalpur / शैलपुत्रि माता की... / शैलपुत्रि माता की आराधना से शारदीय नवरात्र आरंभ, नवरात्र के पहले दिन मां दुर्गा के ही शैलपुत्री स्वरूप की पूजा की जाती है। महाराज पर्वतराज हिमालय के यहां पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण माता का नाम शैलपुत्री पड़ा। पूर्व जन्म में ये प्रजापति दक्ष की कन्या थीं, तब इनका नाम सती था। इनका विवाह भगवान शिव शंकरजी से हुआ था। जब प्रजापति दक्ष के यज्ञ में माता सती ने अपने शरीर को भस्म कर लिया और अगले जन्म में शैलराज हिमालय के यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया। उपनिषद् की एक कथा के अनुसार मां दुर्गा के हैमवती स्वरूप से देवताओं का गर्व-भंजन किया था। नव दुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री का महत्व और शक्तियां अनन्त हैं। नवरात्र पूजन में प्रथम दिन शैलपुत्री माँ का ही पूजा और उपासना की जाती है।   या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।   माँ  शैलपुत्रि की आरती जय जगजननी जय जगदम्बा अम्बा, शैलपुत्रि माता । नो दुर्गा नो रूप में तुम हो, पहले दिन की माता । ओम शं शैलपुत्रि दैव्ये नमः, ओम शं शैलपुत्रि दैव्ये नमः ।   हेमवती हिम कन्या कहता, कहता कोई  पार्वती । सती हुई तुम पिछले जनम में, दक्ष कन्या महासती । ओम शं शैलपुत्रि दैव्ये नमः, ओम शं शैलपुत्रि दैव्ये नमः ।   नेत्र तुम्हारे तीन हैं मां, वृषभ तुम्हारा वाहन ।  धवल प्रिया श्वेताम्बरी मां, नाम तुम्हारा पावन । ओम शं शैलपुत्रि दैव्ये नमः, ओम शं शैलपुत्रि दैव्ये नमः ।   त्रिशूल है दाएं कर में, कमल है बाएं हाथ में । उसको कोई चिंता नहीं, तुम रहती जिसके साथ में । ओम शं शैलपुत्रि दैव्ये नमः, ओम शं शैलपुत्रि दैव्ये नमः ।   जय जगजननी जय जगदम्बा अम्बा, शैलपुत्रि माता । नो दुर्गा नो रूप में तुम हो, पहले दिन की माता । ओम शं शैलपुत्रि दैव्ये नमः, ओम शं शैलपुत्रि दैव्ये नमः ।



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By  Public Reporter
posted : Tue/Apr 20, 2021, 12:14 PM - IST

Wardha / माँ ही है ममता की... / नवरात्रि क्यों मनाते है? नवरात्रि यह संस्कृत का शब्द है जो नव+रात्रि यह दो शब्दों को जोड़कर बना है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सृष्टि का निर्माण हुआ था था, इसलिए इस दिन हिन्दू नववर्ष के तौर पर मनाया जाता है। इस दिन को संवत्सरारंभ, गुडीपडवा, युगादी, वसंत ऋतु प्रारंभ दिन आदी नामों से भी जाना जाता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नववर्ष मनाने के नैसर्गिक, ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक कारण हैं। इन नों रातो तक माँ दुर्गा के नों रूपो की पूजा आराधना की जाती है। हिंदी कैलेंडर के अनुसार नवरात्रि वर्ष में 4 बार पोष, चैत्र, शरद, एव आषाढ़ माह में आती है। ओर चारो माह में प्रतिपदा से लेकर नवमी तक नवरात्रि मनाने का नियम है। नवरात्रि क्या है?   यह नवरात्रि हिन्दू धर्मावलम्बीओ के द्वारा मनाया जाने वाला मुख्य पर्व माना जाता है।  कम लोगों को ज्ञात होगा कि एक साल में नवरात्र के 4 बार पड़ते हैं। साल के प्रथम मास चैत्र में पहली नवरात्र होती है, फिर चौथे माह आषाढ़ में दूसरी नवरात्र पड़ती है। इसके बाद अश्विन माह में प्रमुख शारदीय नवरात्र होती है। साल के अंत में माह में गुप्त नवरात्र होते हैं। इन सभी नवरात्रों का जिक्र देवी भागवत तथा अन्य धार्मिक ग्रंथों में भी किया गया है। हिंदी कैलेंडर के हिसाब से चैत्र माह से हिंदू नववर्ष की भी शुरुआत होती है, और इसी दिन से नवरात्र भी शुरू होते हैं, लेकिन सर्वविदित है कि चारों में चैत्र और शारदीय नवरात्र प्रमुख माने जाते हैं। एक साल में यह दो नवरात्र मनाए जाने के पीछे की वजह भी अलग-अलग तरह की है। भारतीय पंचांग के अनुसार चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा से मनाया जाता है. इसे नवसंवत्सर कहते हैं। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार भगवान द्वारा विश्व को बनाने में सात दिन लगे थे। इस सात दिन के सन्धान के बाद नया वर्ष मनाया जाता है। यह दिन ग्रेगरी के कैलेण्डर के मुताबिक 5 सितम्बर से 5 अक्टूबर के बीच आता है। हिन्दुओं का नया साल चैत्र नव रात्रि के प्रथम दिन यानी गुड़ी पड़वा पर हर साल भारतीय पंचांग के अनुसार प्रथम मास का प्रथम चन्द्र दिवस नव वर्ष के रूप में मनाया जाता है। यह प्रायः 21 मार्च से 21 अप्रैल के बीच पड़ता है। ग्रन्थो में लिखा है कि जिस दिन सृष्टि का चक्र प्रथम बार विधाता ने प्रवर्तित किया, उस दिन चैत्र शुदी 1 रविवार था। हमारे लिए आने वाला संवत्सर 2078 बहुत ही भाग्यशाली होगा, क्योंकि इस वर्ष भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को रविवार है, शुदी एवम शुक्ल पक्ष एक ही है। चैत्र नवरात्रि नवरात्रि वह समय होता है जब दो ऋतुएँ मिलती हैं। संयोग की इस अवधि में, ब्रह्माण्ड से असीम शक्तियाँ ऊर्जा के रूप में हमारे पास पहुँचती हैं। हर साल दो नवरात्रि होती है चैत्र नवरात्रि और आश्विन नवरात्रि चैत्र नवरात्रि में गर्मी के मौसम की शुरुआत होती है और इस समय प्रकृति एक बड़े परिवर्तन के लिये तैयार होती है। भारत में, चैत्र नवरात्रि के दौरान, लोग उपवास रखकर, अपने शरीर को आने वाली गर्मी के लिए तैयार करते हैं। प्रतिपदा : पहला दिन 1. पूजित देवी : शैलपुत्री 2. चढ़ाया जाने वाला प्रसाद : केले 3. रंग : इस दिन हरे रंग का महत्व होता है।  द्वितीया : दूसरा दिन 1. पूजित देवी : देवी ब्रह्मचारिणी 2. चढ़ाया जाने वाला प्रसाद : गाय के दूध से बना घी 3. रंग : इस दिन नीला रंग का महत्व होता है।  तृतीया : तीसरा दिन 1. पूजित देवी : देवी चंद्रघंटा 2. चढ़ाया जाने वाला प्रसाद : नमकीन मक्खन 3. रंग : इस दिन लाल रंग का महत्व होता है। चतुर्थी : चौथा दिन 1. पूजित देवी : देवी कुष्मांडा 2. चढ़ाया जाने वाला प्रसाद : चीनी की मिठाई 3. रंग : इस दिन नारंगी रंग का महत्व होता है।  पंचमी : पाचवा दिन 1. पूजित देवी : देवी स्कंदमाता 2. चढ़ाया जाने वाला प्रसाद : चावल का हलवा/दूध 3. रंग : इस दिन पीले रंग का महत्व होता है। षष्ठी : छटवा दिन 1. पूजित देवी : देवी कात्यायनी 2. चढ़ाया जाने वाला प्रसाद : मालपुआ 3. रंग : इस दिन नीले रंग का महत्व होता है। सप्तमी : सातवा दिन 1. पूजित देवी : देवी कालरात्रि 2. चढ़ाया जाने वाला प्रसाद : शहद 3. रंग :  इस दिन बैंगनी रंग का महत्व होता है। अष्टमी : आठवा दिन 1. पूजित देवी : देवी महागौरी 2. चढ़ाया जाने वाला प्रसाद : गुड़, नारियल 3. रंग : इस दिन गुलाबी रंग का महत्व होता है। नवमी : नोवा दिन 1. पूजित देवी : देवी सिद्धिदात्री 2. चढ़ाया जाने वाला प्रसाद : गेहूँ के आटे का हलवा 3. रंग : इस दिन सोनेरी रंग का महत्व होता है।



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By  manju manju
posted : Mon/May 10, 2021, 11:03 AM - IST

New Delhi / सत्य नारायण व्रत... / दिल्ली/ सत्य नारायण व्रत कथा सत्य नारायण भगवान की कथा लोक में प्रचलित है। हिंदू धर्मावलंबियो के बीच सबसे प्रतिष्ठित व्रत कथा के रूप में भगवान विष्णु के सत्य स्वरूप की सत्य नारायण व्रत कथा है। कुछ लोग मनौती पूरी होने पर, कुछ अन्य नियमित रूप से इस कथा का आयोजन करते हैं। सत्यनारायण व्रत का अनुष्ठान करके मनुष्य सभी दु:खों से मुक्त हो जाता है। कलिकाल में सत्य की पूजा विशेष रूप से फलदायी होती है सत्य के अनेक नाम हैं, यथा-सत्य नारायण, सत्यदेव। सनातन सत्य रूपीविष्णु भगवान कलियुग में अनेक रूप धारण करके लोगों को मनोवांछित फल देंगे।



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By  Public Reporter
posted : Fri/May 14, 2021, 04:47 AM - IST

Mumbai / जाने क्यों अक्षय... / आज ही के दिन जैनों के प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव जी भगवान ने 13 महीने का कठिन निरंतर उपवास (बिना जल का तप) का पारणा (उपवास छोडना) इक्षु (गन्ने) के रस से किया था। और आज भी बहुत जैन भाई व बहने वही वर्षी तप करने के पश्चात आज उपवास छोड़ते है और नये उपवास लेते है और भगवान को गन्ने के रस से अभिषेक किया जाता है।  ऐसा माना जाता है कि आज ही के दिन माँ गंगा का अवतरण धरती पर हुआ था। ओर महर्षि परशुराम का जन्म आज ही के दिन हुआ था।इसी तरहा ऐसा भी कहा जाता है कि माँ अन्नपूर्णा का जन्म भी आज ही के दिन हुआ था। महाभारत मे द्रोपदी को चीरहरण से कृष्ण ने आज ही के दिन बचाया था। यह आज का ही दिन था जहां कृष्ण और सुदामा का मिलन आज ही के दिन हुआ था।  कुबेर को आज ही के दिन खजाना मिला था। सतयुग और त्रेता युग का प्रारम्भ आज ही के दिन हुआ था। ब्रह्मा जी के पुत्र अक्षय कुमार का अवतरण भी आज ही के दिन हुआ था। प्रसिद्ध तीर्थ स्थल श्री बद्री नारायण जी का कपाट आज ही के दिन खोला जाता है। बृंदावन के बाँके बिहारी मंदिर में साल में केवल आज ही के दिन श्री विग्रह चरण के दर्शन होते हैं। अन्यथा साल भर वो वस्त्र से ढके रहते हैं। इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था। अक्षय तृतीया अपने आप में स्वयं सिद्ध मुहूर्त है। कोई भी शुभ कार्य का प्रारम्भ किया जा सकता है। आप सभी को अक्षय-तृतीया की बहुत सारी शुभकामनायें



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By  manju manju
posted : Fri/Jul 09, 2021, 11:32 AM - IST

Noida / Srimad Bhagvad... / देवर्षि नारद की भक्ति से भेंट श्रीमदभागवत जी के महात्म के प्रथम अध्याय के पहले श्लोक में सत-चित-आनन्द स्वरूप परमात्मा की स्तुति की गई है नमन किया गया है जिसके द्वारा इस जगत की उत्पत्ति, पालन तथा विनाश आदि हो रहा है, तथा जो इस जगत के प्राणिंयों को उसके जीवन में व्यापत त्रितापों (दैहिक, दैविक तथा भौतिक तापों) अर्थात कष्टों से मुक्ति प्रदान करने वाला है I श्लोक में बताया गया कि परमात्मा सत-चित-आनन्द स्वरूप है सत अर्थात परमात्मा नित्य है शाश्वत है, चित अर्थात शुद्ध चैतन्य स्वरूप तथा आनन्द से परिपूर्ण है तथा वही पर्मात्मा जो इस सम्पूर्ण विश्व का इस बृम्हांड का उत्पत्तिकर्ता है जो इस सम्पूर्ण विश्व का पालन कर रहा है तथा नवश्रजन के लिये इस विश्व का विनाश कर्ता है उस पर्मात्मा श्री कृष्ण को हम सभी जीव नमन करते हैं, यहां श्रीकृष्ण कहा है श्री अर्थात परमात्मा की शक्ति श्री राधा रानी सहित परमात्मा प्रेमाधार कृष्ण को नमन किया गया है I        



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By  manju manju
posted : Sun/Jul 11, 2021, 03:11 AM - IST

Noida / Srimad Bhagvad... / माहात्म्य-2 भक्ति का दुख दूर करने के लिए नारद जी का उदद्योग नारद जी ने कहा- बाले! तुम व्यर्थ ही अपने को क्यों खेद में डाल रही हो? अरे! तुम इतनी चिन्तातुर क्यों हो? भगवान श्रीकृष्ण के चरण कमलों का चिंतन करो। उनकी कृपा से तुम्हारा सारा दुख दूर हो जाएगा।      



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By  Avis Avis
posted : Wed/Jul 21, 2021, 09:49 AM - IST

Nagpur Division / भक्ती / नवविधा भक्तीमध्ये मी स्वतः कोणत्या पायरीवर आहे. श्रवणं कीर्तनं विष्णो :स्मरणं पादसेवनम् । अर्चनं वंदनं दास्यं सख्यं आत्मनिवेदनम। ।  नवविधा भक्तीत श्रवण ही पहिली पायरी आहे ,तर आत्मनिवेदन ही शेवटची .श्रवण भक्तीमार्गाचे प्रवेशद्वार आहे.श्रवण शब्द्दाचा अर्थ ऐकणे आहे असे आपण म्हणतो ,पण श्रवण म्हणजे नुसते ऐकणे नाही तर ऐकलेले जीवनात उतरवणे.कौरव पांडवांची एक गोष्ट आहे .कौरव पांडवांचे गुरु द्रोणाचार्य मुलांना एक धडा दिला नेहमी खरे बोलावे क्रोध करू नये .दुसा -या दिवशी द्रोणाचार्यनी मुलांना विचारले ,मुलांनो काल काय शिकलात ? मुलांनी दोन्ही वाक़ये पाठ म्हणून दाखवली .युधिष्ठीराने सांगितले ,'माझी दोन्ही वाक़ये पाठ झाली नाहीत .'१० -१२ दिवसाने युधिष्ठीराने पुन्हा तेच उत्तर दिले तेव्हा द्रोणाचार्य ना काळजी वाटू लागली .त्यांनी भिष्माचा-यांना सांगितले .युधिष्टीर भीष्माचा -यांना म्हणाला .'गेल्या १० -१२ दिवसात मी नेहमी खरे बोललो .त्यामुळे ते वाक्य पाठ झाल्यासारखे आहे .पण क्रोध करू नये हे वाक्य पाठ होत नाही . कारण काहीतरी कारणांनी राग येतोच.भीष्मांना आनंद झाला ।.आपल्या नातवाला ऐकणे व श्रवण यातला फरक कळला। समर्थांनी परमार्थाचे मुख्य साधन श्रवण सांगितले आहे .श्रवण अनेक विषयांचे करायला सांगितले आहे -कर्ममार्ग ज्ञानमार्ग ,सिध्दांतमार्ग ,योगमार्ग ,वैराग्य मार्ग ,नाना व्रते ,नाना तीर्थ ,नाना दाने ,नाना महात्मे ,योग ,मुद्रा ,आसने पिंड ज्ञान सृष्टीज्ञान ,संगीत ,चौदा विद्या ,चौसष्ट कला ,या सर्व गोष्टी श्रवण करायला सांगतात. परमार्थ मार्गाला लागणारा साधक चाळीसी पन्नासी नंतर लागला तर तो हे सर्व वाचू शकणार नाही , मग समर्थांनी हे सर्व वाचायला का सांगितल ? कारण समर्थांच्या पुढे त्यांचे कार्य पुढे नेणारा त्यांचा महंत होता .तो बहुश्रुतच असायला हवा होता त्याला लोकांनी विचारलेल्या कोणत्याही प्रश्नाचे उत्तर देता यायला हवे. सामान्य साधक जेव्हा श्रवण करतो तेव्हा त्याला समर्थ मार्गदर्शन करतात. ऐसे हे अवघेची ऐकावे । परंतु सार शोधून घ्यावे । असार ते जाणून त्यागावे । या नाव श्रवण भक्ती । । ४ -१ -२९ । ।  सार म्हणजे समर्थांनी सांगितलेली उत्तम लक्षणे,चातुर्य लक्षणे ,सदविद्या लक्षणे ,सत्वगुण लक्षणे ,सार घ्यायचे म्हणजे वर सांगितलेले सद्गुण आपल्यात उतरवण्याचा प्रयत्न करणे ,असार जाणून टाकावे म्हणजे मूर्ख लक्षणे ,पढ़त मूर्ख लक्षणे ,कुविद्या लक्षणे ,तमोगूण लक्षणे या समासातील दुर्गूण काढून टाकणे. श्रावणात केवळ ऐकणे नसते ,तर ऐकलेल्या गोष्टींचे मनन व्हावे लागते व निदिध्यास ही । या नावे जाणावे मनन । अर्थालागी सावधान । निजध्यासे समाधान । होत असे । । ७ -८ -३९ । ।  मनन म्हणजे आपण जे ऐकतो त्याचे चिंतन करणे ,त्याचे अर्थाकडे लक्ष देणे . निदिध्यास म्हणजे एखाद्या गोष्टीची मनाला लागलेली ओढ़ .



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By  Avis Avis
posted : Fri/Jul 23, 2021, 08:15 AM - IST

Nagpur / भक्ती / सोबत जोडलेले चित्र नीट निरखून पहा!    समर्थ रामदास स्वामींनी भारतभर मठस्थापना केली  हे तर आपण जाणतोच.परंतु समर्थांचे पंढरपुरात आजही तीन मठ आहेत हे फार थोड्या लोकांना माहिती असते.समर्थानी पंढरपुरात मठ स्थापना करण्याची आज्ञा ज्या शिष्याला दिली ते अनंतबुवा मेथवडेकर रामदासी!आजही त्यांच्या वंशजांनी हा मठ आणि त्या मठाची आषाढी वारीची परंपरा जपली आहे!आता या पार्श्वभूमीवर सोबत जोडलेले चित्र नीट निरखून पहा! प्रसंग असा झाला कि समर्थ कल्याणासोबत पंढरपुरात पांडुरंगाच्या दर्शनासाठी आले!त्यांना अनंतबुवा मंदिरात घेऊन गेले. पण समोर विठ्ठल कुठे दिसतोय! समोर तर साक्षात प्रभुरामचंद्र उभे आहेत असेच समर्थाना दिसू लागले!त्यांना प्रश्न पडला की इथे राम असा का उभा राहिलाय? हातातले धनुष्य बाण कुठे गेले? वानरदळ  कुठे गेले? सीतामाई कुठे गेल्या? हे सर्व प्रश्न "येथे का रे उभा श्रीरामा " या  आपल्या प्रसिद्ध अभंगातून समर्थानी विठ्ठलाला विचारले आणि अखेरीस त्यांना साक्षात त्या जगन्नियंत्या पांडुरंगाने सगुण दर्शन दिले!रामदासी जैसा भाव... तैसा झाला पंढरीराव !या प्रसंगाचे चित्रण या सोबतच्या चित्रात आपल्याला दिसेल! आज आषाढी एकादशीच्या निमित्ताने आपणा सर्वांनाही ते दर्शन घडावे म्हणून चित्र जोडले. हे दुर्मिळ चित्र जतन करून आम्हा  विठू-समर्थभक्तांना पाठविल्याबद्दल श्री प्रमोद रामदासी (सध्या राहाणार मॅडिसन अमेरिका) यांचे खूप आभार ! सर्वांना हे दर्शन घडवा!



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By  s verma
posted : Thu/Jan 01, 1970, 05:30 AM - IST

Jabalpur / शैलपुत्रि माता की... / शैलपुत्रि माता की आराधना से शारदीय नवरात्र आरंभ, नवरात्र के पहले दिन मां दुर्गा के ही शैलपुत्री स्वरूप की पूजा की जाती है। महाराज पर्वतराज हिमालय के यहां पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण माता का नाम शैलपुत्री पड़ा। पूर्व जन्म में ये प्रजापति दक्ष की कन्या थीं, तब इनका नाम सती था। इनका विवाह भगवान शिव शंकरजी से हुआ था। जब प्रजापति दक्ष के यज्ञ में माता सती ने अपने शरीर को भस्म कर लिया और अगले जन्म में शैलराज हिमालय के यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया। उपनिषद् की एक कथा के अनुसार मां दुर्गा के हैमवती स्वरूप से देवताओं का गर्व-भंजन किया था। नव दुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री का महत्व और शक्तियां अनन्त हैं। नवरात्र पूजन में प्रथम दिन शैलपुत्री माँ का ही पूजा और उपासना की जाती है।   या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।   माँ  शैलपुत्रि की आरती जय जगजननी जय जगदम्बा अम्बा, शैलपुत्रि माता । नो दुर्गा नो रूप में तुम हो, पहले दिन की माता । ओम शं शैलपुत्रि दैव्ये नमः, ओम शं शैलपुत्रि दैव्ये नमः ।   हेमवती हिम कन्या कहता, कहता कोई  पार्वती । सती हुई तुम पिछले जनम में, दक्ष कन्या महासती । ओम शं शैलपुत्रि दैव्ये नमः, ओम शं शैलपुत्रि दैव्ये नमः ।   नेत्र तुम्हारे तीन हैं मां, वृषभ तुम्हारा वाहन ।  धवल प्रिया श्वेताम्बरी मां, नाम तुम्हारा पावन । ओम शं शैलपुत्रि दैव्ये नमः, ओम शं शैलपुत्रि दैव्ये नमः ।   त्रिशूल है दाएं कर में, कमल है बाएं हाथ में । उसको कोई चिंता नहीं, तुम रहती जिसके साथ में । ओम शं शैलपुत्रि दैव्ये नमः, ओम शं शैलपुत्रि दैव्ये नमः ।   जय जगजननी जय जगदम्बा अम्बा, शैलपुत्रि माता । नो दुर्गा नो रूप में तुम हो, पहले दिन की माता । ओम शं शैलपुत्रि दैव्ये नमः, ओम शं शैलपुत्रि दैव्ये नमः ।



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By  Public Reporter
posted : Tue/Apr 20, 2021, 12:14 PM - IST

Wardha / माँ ही है ममता की... / नवरात्रि क्यों मनाते है? नवरात्रि यह संस्कृत का शब्द है जो नव+रात्रि यह दो शब्दों को जोड़कर बना है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सृष्टि का निर्माण हुआ था था, इसलिए इस दिन हिन्दू नववर्ष के तौर पर मनाया जाता है। इस दिन को संवत्सरारंभ, गुडीपडवा, युगादी, वसंत ऋतु प्रारंभ दिन आदी नामों से भी जाना जाता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नववर्ष मनाने के नैसर्गिक, ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक कारण हैं। इन नों रातो तक माँ दुर्गा के नों रूपो की पूजा आराधना की जाती है। हिंदी कैलेंडर के अनुसार नवरात्रि वर्ष में 4 बार पोष, चैत्र, शरद, एव आषाढ़ माह में आती है। ओर चारो माह में प्रतिपदा से लेकर नवमी तक नवरात्रि मनाने का नियम है। नवरात्रि क्या है?   यह नवरात्रि हिन्दू धर्मावलम्बीओ के द्वारा मनाया जाने वाला मुख्य पर्व माना जाता है।  कम लोगों को ज्ञात होगा कि एक साल में नवरात्र के 4 बार पड़ते हैं। साल के प्रथम मास चैत्र में पहली नवरात्र होती है, फिर चौथे माह आषाढ़ में दूसरी नवरात्र पड़ती है। इसके बाद अश्विन माह में प्रमुख शारदीय नवरात्र होती है। साल के अंत में माह में गुप्त नवरात्र होते हैं। इन सभी नवरात्रों का जिक्र देवी भागवत तथा अन्य धार्मिक ग्रंथों में भी किया गया है। हिंदी कैलेंडर के हिसाब से चैत्र माह से हिंदू नववर्ष की भी शुरुआत होती है, और इसी दिन से नवरात्र भी शुरू होते हैं, लेकिन सर्वविदित है कि चारों में चैत्र और शारदीय नवरात्र प्रमुख माने जाते हैं। एक साल में यह दो नवरात्र मनाए जाने के पीछे की वजह भी अलग-अलग तरह की है। भारतीय पंचांग के अनुसार चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा से मनाया जाता है. इसे नवसंवत्सर कहते हैं। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार भगवान द्वारा विश्व को बनाने में सात दिन लगे थे। इस सात दिन के सन्धान के बाद नया वर्ष मनाया जाता है। यह दिन ग्रेगरी के कैलेण्डर के मुताबिक 5 सितम्बर से 5 अक्टूबर के बीच आता है। हिन्दुओं का नया साल चैत्र नव रात्रि के प्रथम दिन यानी गुड़ी पड़वा पर हर साल भारतीय पंचांग के अनुसार प्रथम मास का प्रथम चन्द्र दिवस नव वर्ष के रूप में मनाया जाता है। यह प्रायः 21 मार्च से 21 अप्रैल के बीच पड़ता है। ग्रन्थो में लिखा है कि जिस दिन सृष्टि का चक्र प्रथम बार विधाता ने प्रवर्तित किया, उस दिन चैत्र शुदी 1 रविवार था। हमारे लिए आने वाला संवत्सर 2078 बहुत ही भाग्यशाली होगा, क्योंकि इस वर्ष भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को रविवार है, शुदी एवम शुक्ल पक्ष एक ही है। चैत्र नवरात्रि नवरात्रि वह समय होता है जब दो ऋतुएँ मिलती हैं। संयोग की इस अवधि में, ब्रह्माण्ड से असीम शक्तियाँ ऊर्जा के रूप में हमारे पास पहुँचती हैं। हर साल दो नवरात्रि होती है चैत्र नवरात्रि और आश्विन नवरात्रि चैत्र नवरात्रि में गर्मी के मौसम की शुरुआत होती है और इस समय प्रकृति एक बड़े परिवर्तन के लिये तैयार होती है। भारत में, चैत्र नवरात्रि के दौरान, लोग उपवास रखकर, अपने शरीर को आने वाली गर्मी के लिए तैयार करते हैं। प्रतिपदा : पहला दिन 1. पूजित देवी : शैलपुत्री 2. चढ़ाया जाने वाला प्रसाद : केले 3. रंग : इस दिन हरे रंग का महत्व होता है।  द्वितीया : दूसरा दिन 1. पूजित देवी : देवी ब्रह्मचारिणी 2. चढ़ाया जाने वाला प्रसाद : गाय के दूध से बना घी 3. रंग : इस दिन नीला रंग का महत्व होता है।  तृतीया : तीसरा दिन 1. पूजित देवी : देवी चंद्रघंटा 2. चढ़ाया जाने वाला प्रसाद : नमकीन मक्खन 3. रंग : इस दिन लाल रंग का महत्व होता है। चतुर्थी : चौथा दिन 1. पूजित देवी : देवी कुष्मांडा 2. चढ़ाया जाने वाला प्रसाद : चीनी की मिठाई 3. रंग : इस दिन नारंगी रंग का महत्व होता है।  पंचमी : पाचवा दिन 1. पूजित देवी : देवी स्कंदमाता 2. चढ़ाया जाने वाला प्रसाद : चावल का हलवा/दूध 3. रंग : इस दिन पीले रंग का महत्व होता है। षष्ठी : छटवा दिन 1. पूजित देवी : देवी कात्यायनी 2. चढ़ाया जाने वाला प्रसाद : मालपुआ 3. रंग : इस दिन नीले रंग का महत्व होता है। सप्तमी : सातवा दिन 1. पूजित देवी : देवी कालरात्रि 2. चढ़ाया जाने वाला प्रसाद : शहद 3. रंग :  इस दिन बैंगनी रंग का महत्व होता है। अष्टमी : आठवा दिन 1. पूजित देवी : देवी महागौरी 2. चढ़ाया जाने वाला प्रसाद : गुड़, नारियल 3. रंग : इस दिन गुलाबी रंग का महत्व होता है। नवमी : नोवा दिन 1. पूजित देवी : देवी सिद्धिदात्री 2. चढ़ाया जाने वाला प्रसाद : गेहूँ के आटे का हलवा 3. रंग : इस दिन सोनेरी रंग का महत्व होता है।



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By  Public Reporter
posted : Fri/May 14, 2021, 04:47 AM - IST

Mumbai / जाने क्यों अक्षय... / आज ही के दिन जैनों के प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव जी भगवान ने 13 महीने का कठिन निरंतर उपवास (बिना जल का तप) का पारणा (उपवास छोडना) इक्षु (गन्ने) के रस से किया था। और आज भी बहुत जैन भाई व बहने वही वर्षी तप करने के पश्चात आज उपवास छोड़ते है और नये उपवास लेते है और भगवान को गन्ने के रस से अभिषेक किया जाता है।  ऐसा माना जाता है कि आज ही के दिन माँ गंगा का अवतरण धरती पर हुआ था। ओर महर्षि परशुराम का जन्म आज ही के दिन हुआ था।इसी तरहा ऐसा भी कहा जाता है कि माँ अन्नपूर्णा का जन्म भी आज ही के दिन हुआ था। महाभारत मे द्रोपदी को चीरहरण से कृष्ण ने आज ही के दिन बचाया था। यह आज का ही दिन था जहां कृष्ण और सुदामा का मिलन आज ही के दिन हुआ था।  कुबेर को आज ही के दिन खजाना मिला था। सतयुग और त्रेता युग का प्रारम्भ आज ही के दिन हुआ था। ब्रह्मा जी के पुत्र अक्षय कुमार का अवतरण भी आज ही के दिन हुआ था। प्रसिद्ध तीर्थ स्थल श्री बद्री नारायण जी का कपाट आज ही के दिन खोला जाता है। बृंदावन के बाँके बिहारी मंदिर में साल में केवल आज ही के दिन श्री विग्रह चरण के दर्शन होते हैं। अन्यथा साल भर वो वस्त्र से ढके रहते हैं। इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था। अक्षय तृतीया अपने आप में स्वयं सिद्ध मुहूर्त है। कोई भी शुभ कार्य का प्रारम्भ किया जा सकता है। आप सभी को अक्षय-तृतीया की बहुत सारी शुभकामनायें



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By  manju manju
posted : Mon/May 10, 2021, 11:03 AM - IST

New Delhi / सत्य नारायण व्रत... / दिल्ली/ सत्य नारायण व्रत कथा सत्य नारायण भगवान की कथा लोक में प्रचलित है। हिंदू धर्मावलंबियो के बीच सबसे प्रतिष्ठित व्रत कथा के रूप में भगवान विष्णु के सत्य स्वरूप की सत्य नारायण व्रत कथा है। कुछ लोग मनौती पूरी होने पर, कुछ अन्य नियमित रूप से इस कथा का आयोजन करते हैं। सत्यनारायण व्रत का अनुष्ठान करके मनुष्य सभी दु:खों से मुक्त हो जाता है। कलिकाल में सत्य की पूजा विशेष रूप से फलदायी होती है सत्य के अनेक नाम हैं, यथा-सत्य नारायण, सत्यदेव। सनातन सत्य रूपीविष्णु भगवान कलियुग में अनेक रूप धारण करके लोगों को मनोवांछित फल देंगे।



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By  manju manju
posted : Fri/Jul 09, 2021, 11:32 AM - IST

Noida / Srimad Bhagvad... / देवर्षि नारद की भक्ति से भेंट श्रीमदभागवत जी के महात्म के प्रथम अध्याय के पहले श्लोक में सत-चित-आनन्द स्वरूप परमात्मा की स्तुति की गई है नमन किया गया है जिसके द्वारा इस जगत की उत्पत्ति, पालन तथा विनाश आदि हो रहा है, तथा जो इस जगत के प्राणिंयों को उसके जीवन में व्यापत त्रितापों (दैहिक, दैविक तथा भौतिक तापों) अर्थात कष्टों से मुक्ति प्रदान करने वाला है I श्लोक में बताया गया कि परमात्मा सत-चित-आनन्द स्वरूप है सत अर्थात परमात्मा नित्य है शाश्वत है, चित अर्थात शुद्ध चैतन्य स्वरूप तथा आनन्द से परिपूर्ण है तथा वही पर्मात्मा जो इस सम्पूर्ण विश्व का इस बृम्हांड का उत्पत्तिकर्ता है जो इस सम्पूर्ण विश्व का पालन कर रहा है तथा नवश्रजन के लिये इस विश्व का विनाश कर्ता है उस पर्मात्मा श्री कृष्ण को हम सभी जीव नमन करते हैं, यहां श्रीकृष्ण कहा है श्री अर्थात परमात्मा की शक्ति श्री राधा रानी सहित परमात्मा प्रेमाधार कृष्ण को नमन किया गया है I        



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By  manju manju
posted : Sun/Jul 11, 2021, 03:11 AM - IST

Noida / Srimad Bhagvad... / माहात्म्य-2 भक्ति का दुख दूर करने के लिए नारद जी का उदद्योग नारद जी ने कहा- बाले! तुम व्यर्थ ही अपने को क्यों खेद में डाल रही हो? अरे! तुम इतनी चिन्तातुर क्यों हो? भगवान श्रीकृष्ण के चरण कमलों का चिंतन करो। उनकी कृपा से तुम्हारा सारा दुख दूर हो जाएगा।      



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By  Avis Avis
posted : Wed/Jul 21, 2021, 09:49 AM - IST

Nagpur Division / भक्ती / नवविधा भक्तीमध्ये मी स्वतः कोणत्या पायरीवर आहे. श्रवणं कीर्तनं विष्णो :स्मरणं पादसेवनम् । अर्चनं वंदनं दास्यं सख्यं आत्मनिवेदनम। ।  नवविधा भक्तीत श्रवण ही पहिली पायरी आहे ,तर आत्मनिवेदन ही शेवटची .श्रवण भक्तीमार्गाचे प्रवेशद्वार आहे.श्रवण शब्द्दाचा अर्थ ऐकणे आहे असे आपण म्हणतो ,पण श्रवण म्हणजे नुसते ऐकणे नाही तर ऐकलेले जीवनात उतरवणे.कौरव पांडवांची एक गोष्ट आहे .कौरव पांडवांचे गुरु द्रोणाचार्य मुलांना एक धडा दिला नेहमी खरे बोलावे क्रोध करू नये .दुसा -या दिवशी द्रोणाचार्यनी मुलांना विचारले ,मुलांनो काल काय शिकलात ? मुलांनी दोन्ही वाक़ये पाठ म्हणून दाखवली .युधिष्ठीराने सांगितले ,'माझी दोन्ही वाक़ये पाठ झाली नाहीत .'१० -१२ दिवसाने युधिष्ठीराने पुन्हा तेच उत्तर दिले तेव्हा द्रोणाचार्य ना काळजी वाटू लागली .त्यांनी भिष्माचा-यांना सांगितले .युधिष्टीर भीष्माचा -यांना म्हणाला .'गेल्या १० -१२ दिवसात मी नेहमी खरे बोललो .त्यामुळे ते वाक्य पाठ झाल्यासारखे आहे .पण क्रोध करू नये हे वाक्य पाठ होत नाही . कारण काहीतरी कारणांनी राग येतोच.भीष्मांना आनंद झाला ।.आपल्या नातवाला ऐकणे व श्रवण यातला फरक कळला। समर्थांनी परमार्थाचे मुख्य साधन श्रवण सांगितले आहे .श्रवण अनेक विषयांचे करायला सांगितले आहे -कर्ममार्ग ज्ञानमार्ग ,सिध्दांतमार्ग ,योगमार्ग ,वैराग्य मार्ग ,नाना व्रते ,नाना तीर्थ ,नाना दाने ,नाना महात्मे ,योग ,मुद्रा ,आसने पिंड ज्ञान सृष्टीज्ञान ,संगीत ,चौदा विद्या ,चौसष्ट कला ,या सर्व गोष्टी श्रवण करायला सांगतात. परमार्थ मार्गाला लागणारा साधक चाळीसी पन्नासी नंतर लागला तर तो हे सर्व वाचू शकणार नाही , मग समर्थांनी हे सर्व वाचायला का सांगितल ? कारण समर्थांच्या पुढे त्यांचे कार्य पुढे नेणारा त्यांचा महंत होता .तो बहुश्रुतच असायला हवा होता त्याला लोकांनी विचारलेल्या कोणत्याही प्रश्नाचे उत्तर देता यायला हवे. सामान्य साधक जेव्हा श्रवण करतो तेव्हा त्याला समर्थ मार्गदर्शन करतात. ऐसे हे अवघेची ऐकावे । परंतु सार शोधून घ्यावे । असार ते जाणून त्यागावे । या नाव श्रवण भक्ती । । ४ -१ -२९ । ।  सार म्हणजे समर्थांनी सांगितलेली उत्तम लक्षणे,चातुर्य लक्षणे ,सदविद्या लक्षणे ,सत्वगुण लक्षणे ,सार घ्यायचे म्हणजे वर सांगितलेले सद्गुण आपल्यात उतरवण्याचा प्रयत्न करणे ,असार जाणून टाकावे म्हणजे मूर्ख लक्षणे ,पढ़त मूर्ख लक्षणे ,कुविद्या लक्षणे ,तमोगूण लक्षणे या समासातील दुर्गूण काढून टाकणे. श्रावणात केवळ ऐकणे नसते ,तर ऐकलेल्या गोष्टींचे मनन व्हावे लागते व निदिध्यास ही । या नावे जाणावे मनन । अर्थालागी सावधान । निजध्यासे समाधान । होत असे । । ७ -८ -३९ । ।  मनन म्हणजे आपण जे ऐकतो त्याचे चिंतन करणे ,त्याचे अर्थाकडे लक्ष देणे . निदिध्यास म्हणजे एखाद्या गोष्टीची मनाला लागलेली ओढ़ .



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By  Avis Avis
posted : Fri/Jul 23, 2021, 08:15 AM - IST

Nagpur / भक्ती / सोबत जोडलेले चित्र नीट निरखून पहा!    समर्थ रामदास स्वामींनी भारतभर मठस्थापना केली  हे तर आपण जाणतोच.परंतु समर्थांचे पंढरपुरात आजही तीन मठ आहेत हे फार थोड्या लोकांना माहिती असते.समर्थानी पंढरपुरात मठ स्थापना करण्याची आज्ञा ज्या शिष्याला दिली ते अनंतबुवा मेथवडेकर रामदासी!आजही त्यांच्या वंशजांनी हा मठ आणि त्या मठाची आषाढी वारीची परंपरा जपली आहे!आता या पार्श्वभूमीवर सोबत जोडलेले चित्र नीट निरखून पहा! प्रसंग असा झाला कि समर्थ कल्याणासोबत पंढरपुरात पांडुरंगाच्या दर्शनासाठी आले!त्यांना अनंतबुवा मंदिरात घेऊन गेले. पण समोर विठ्ठल कुठे दिसतोय! समोर तर साक्षात प्रभुरामचंद्र उभे आहेत असेच समर्थाना दिसू लागले!त्यांना प्रश्न पडला की इथे राम असा का उभा राहिलाय? हातातले धनुष्य बाण कुठे गेले? वानरदळ  कुठे गेले? सीतामाई कुठे गेल्या? हे सर्व प्रश्न "येथे का रे उभा श्रीरामा " या  आपल्या प्रसिद्ध अभंगातून समर्थानी विठ्ठलाला विचारले आणि अखेरीस त्यांना साक्षात त्या जगन्नियंत्या पांडुरंगाने सगुण दर्शन दिले!रामदासी जैसा भाव... तैसा झाला पंढरीराव !या प्रसंगाचे चित्रण या सोबतच्या चित्रात आपल्याला दिसेल! आज आषाढी एकादशीच्या निमित्ताने आपणा सर्वांनाही ते दर्शन घडावे म्हणून चित्र जोडले. हे दुर्मिळ चित्र जतन करून आम्हा  विठू-समर्थभक्तांना पाठविल्याबद्दल श्री प्रमोद रामदासी (सध्या राहाणार मॅडिसन अमेरिका) यांचे खूप आभार ! सर्वांना हे दर्शन घडवा!



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